
रे मूढ मति,बुद्धि के गागर भर
शीर्षक:–जीवन का ज्ञान
पंचतत्व से बना हुआ
यह पावन शरीर।
खींचातानी भागदौड़ में
जीवन न यूँ व्यर्थ कर।
फिर मिले न मिलें यह जीवन
अहंकार न मन में भर
कौन जाने कल क्या होगा
भटक रहा यह मन चंचल
समझ समय का मोल
समय चूक करें पश्चाताप
चंचल मन स्थिर कर
रे मूढ़ मति बुद्धि के गागर भर।।
यह दुनिया गोरखधंधा
हर रिश्ता स्वार्थ का धंधा।
मतलब से हर होता बंदा
स्वार्थ हुआ कोई साथ होता
खोल चक्षु देख चहूँओर
खोया है कित भ्रम में मुसाफिर
इधर उधर की बातों में न तु उलझ
आडंबर माया में कभी न तु जकड़।।
बंद बुद्धि खोल अपना खोल मन के द्वार।
रे मूढ मति बुद्धि के गागर भर।।
चेत मन जीवन कर सार्थक
बन कर्मी कर्मपथ पर चल
भव मे यूँ न भटका कर
जन्म मरण है मौलिक तत्व
भक्ति से कर जीवन उद्धार
भगवद् से पनपता है संस्कार।।
शास्त्रों से जानों जीवन का ज्ञान।
रे मूढ मति बुद्धि के गागर भर।।
स्वरचित:–डॉ अनुपम भारद्वाज मिश्रा




