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जिन्दा रावण

 

जिन्दा रावण

चलो सोहनी मेला देखने चलते हैं।
देखो… मोहल्ले के सभी वहाँ जा रहे हैं।
रमा ने कहा, “नहीं, मैं नहीं जाऊंगी।’
‘क्यों?अरे! दीपावली का त्योहार जो पास में आया है, कुछ खरीदारी नहीं करनी।’
इससे ही देश भर के कलाकारों का भाग्योदय होता है। उसके निमित्त हम ग्राहक ही बनते हैं ना।
अच्छी -अच्छी सजावटी सामग्री होती है।

लेकिन सोहनी मुझे भीड़ से डर लगता है।

ऐसे डरते रहने से , रमा तुम आगे बढ़ नहीं सकती। चारों तरफ भीड़ ही भीड़ है ,उसका सामना तो करना ही पड़ेगा ।

सामना करने की भी हद होती है । पिछले रविवार को छोटे बाजार में ही गई थी। मेरा पर्स हाथ से छिन कर वह जवान लड़का ऐसी तेजी से नो दो ग्यारह हो गया।
मैं चिल्लाने लगी, भीड़ जमा हो गई। लेकिन लड़का कहीं दिखाई नहीं दिया।
इस अफ़रा-तफ़री में एक महिला को किसी का धक्का लग गया।
वो बेचारी महिला जमीन पर गिर पड़ी।
मेरी आंखों के सामने से ये दृश्य अभी भी दूर नहीं हैं।

सोहनी ने अपना दाहिना हाथ जिस पर जलने का बड़ा निशान था, दिखाया। जानती हो सड़क से गुजर रही थी एक लफंगे ने गरम चाय मेरे हाथ पर फेंकी और भाग गया।उसे कोई पकड़ भी नहीं सका।
लेकिन मैंने तय कर लिया ऐसे खुले आम घूमने वाले रावणों को जमकर दबोचना है।
सिर्फ जलते रावण का धुआं और पटाखों की आवाज नहीं सुननी ।
रमा की आंखों की चमक देखते ही सोहनी ने उसका हाथ थाम लिया।

अमिता मराठे
इंदौर

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