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गुरु पूर्णिमा

गुरु पूर्णिमा

 

अंधकार से ज्ञान की ज्योति, जलाने वाले गुरु मेरा, 

भूल-भटके पापी को सही राह दिखाने वाले गुरु मेरा।

 

माता-पिता ,गुरु तीनों ही ,होते साक्षात् भगवान वो,  

पार लगाते जीवन का ,वो मिटा देते अज्ञान को।

 

विद्यालयों में चॉक की धूल से, किस्मत सबका लिखते हैं,  

डांट में भी प्यार घोल कर ,मन में ज्ञान को सींचते हैं।  

 

असफलता पर हौसला भरते, कि और भी मेहनत करना,

सफलता पर गर्व से कहते हैं , आगे बढ़ते रहना।

 

नदी सम ज्ञान बहाते हैं ,पाहन

को हीरा बना देते, 

पंखों में उड़ान भरते हैं,हर डाल में फूल खिला देते।

 

एक अक्षर जो ज्ञान सिखाया, जीवन का आधार बना,

बीच भंवर में अटके हुए ,नैया का पतवार बना।

 

शब्दों में बयां कर नहीं सकते, गुरु की महिमा अपरम्पार,

जन्म जन्म तक ऋणी गुरु की, मन से करुं पुकार।

 

सागर जितना गहरा है वेदों का सार, गीता का ज्ञान।

आकाश जितनी ऊंची उसके कर्म की सीख,धर्म का मान।

 

गीली मिट्टी सी कच्चे मन में, कुम्हार बनकर तराशा है,

गुरु चरणों में कोटि नमन,जो

दीपक बन भरे आशा है।

 

     चन्द्रकला शर्मा प्रधानाध्यापिका छत्तीसगढ़

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