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मैं क्या चाहूँ सावन में

मैं क्या चाहूँ सावन में  

 

रिमझिम-रिमझिम मेघा बरसे,

तन भीगे, मन तरसे।

देख-देख प्रकृति की शोभा,

जियरा मेरा हरषे।

फिर भी कोई याद आए

इस रिमझिम बयार में।

 

दिल भीतर-भीतर सुलगता जाए,

ऊपर से तन भीगता जाए।

ऐसी उलझन मन में समाए,

बिन तेरे कुछ भी न भाए।

 

कैसे तुझको पुकारूँ,

मेरे स्वर भी गुम हो जाएँ।

रिमझिम की इस मधुर धुन में

मेरे स्वर भी खो जाएँ।

 

चारों ओर सखियाँ घेरें,

हँस-हँस कर कुछ पूछें।

हर कोई कहे—

“क्यों इतनी ग़मगीन हैं अँखियाँ?”

 

तेरे नैना किसको ढूँढ़ते हैं?

सच-सच मुझसे कह दे।

किसकी याद में खोई रहती है,

अपने मन की बात बता दे।

 

ओ भोली-भाली बाला,

मैं क्या चाहूँ, कहूँ तो कैसे?

बिना कहे ही मेरे मन की

हर धड़कन को समझ ले।

 

बिना बोले मुख देखकर

मन की भाषा समझ ले।

मैं क्या चाहूँ इस दुनिया से?

बस तू ही मुझे अपना ले।

 

— नीलम प्रभा सिन्हा

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