विषय : मंदिर के द्वार पर क्यों बैठा जाता है?

नमन मंच
दिनांक : 23.8.26
विषय : मंदिर के द्वार पर क्यों बैठा जाता है?
मेरी स्मृति-पटल पर आज भी वह दिन अपनी ताजगी लिए हुए है। प्रतिदिन मंदिर में दर्शन करने के बाद वे मूर्ति के समक्ष खड़े होकर पूरे दिन का चिट्ठा भगवान को सुना देते थे। फिर मंदिर के बाहर ओटले पर कुछ देर बैठकर कहते—
“देवा च्या दारी विसावा घ्यावा,
हे देवा पुढचा जन्म कधी न यावा।”
फिर चेहरे पर एक संतोषभरी मुस्कान लिए घर लौटते थे।
तब शायद इस सहज-सी लगने वाली क्रिया का गहरा अर्थ समझ में नहीं आता था। आज लगता है कि दिनभर की व्यस्तता, चिंताओं और मन के बोझ को भगवान को सौंपकर निश्चिंत हो जाना ही तो इसका भाव था। अपने भीतर प्रवेश करने से पहले मन को शांत करना और चेतना को स्थिर करना—यह अंतर्मुखी होने का कितना सहज आध्यात्मिक अभ्यास है!
मंदिर के द्वार पर बैठना केवल विश्राम करना नहीं, बल्कि स्वयं को कुछ क्षण संसार से अलग कर अपने भीतर देखने का अवसर देना है। इससे विकारों से मुक्त होने की वृत्ति जागती है और भगवान के प्रति समर्पण का भाव दृढ़ होता है।
मंदिर की चौखट पर बैठकर हम मानो अपनी सांसारिक चिंताओं और बंधनों को कुछ क्षणों के लिए बाहर ही छोड़ देते हैं। साथ ही यह भाव भी प्रकट होता है कि भगवान के दरबार में सभी समान हैं; वहाँ अहंकार नहीं, केवल विनम्रता का स्थान है।
शायद इसी कारण मंदिर के द्वार पर बैठना मुक्ति और जीवन-मुक्ति की आकांक्षा का भी प्रतीक माना जा सकता है। मंदिर का पवित्र और शांत वातावरण हमारे स्वधर्म—शांति का अनुभव कराता है। एकाग्रता, एकरसता और उस वातावरण का विशेष आध्यात्मिक आकर्षण हमें कुछ क्षण मंदिर के द्वार पर बैठकर स्वयं से जुड़ने के लिए प्रेरित करता है।
दिनभर की भागदौड़ के बाद मंदिर की चौखट पर बैठा मन जैसे कहता है—अब सब कुछ तुम्हें सौंप दिया, प्रभु!
अब कुछ क्षण मुझे अपने भीतर ठहरने दो।
शायद इसीलिए मंदिर के द्वार पर बैठना केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि मन को शांत करने, स्वयं को समेटने और परमात्मा के प्रति समर्पित होने की एक सुंदर आध्यात्मिक प्रक्रिया है।
अमिता मराठे
इंदौर, मध्यप्रदेश




