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बरसात – कविता

बरसात – कविता

 

 

बारिश की रिमझिम बूंदें रह-रह कर बरस रही,  

देखो चारों ओर सखि काली-काली घटाएं छाईं।

 

फूल खिले हैं उपवन-उपवन, चारों ओर खुशबू छाई,  

मन मोर मचल रहे, उसे पाने के लिए तरस रही।

 

तुमसे मिले दिल खिले बरसात में मेरी,  

खुशी मिली हर क्षण बरसात में सजनी।

 

जब-जब फूल खिलें, याद आई हर क्षण तेरी,  

अब रह सकूँ न तुम बिन, बरसात में मन-प्राण मेरी।

 

मन-मस्तिष्क में धमा-चौकड़ी मची रही यादें तेरी,  

कैसे संभालूँ तेरी धमा-चौकड़ी से मन को अपनी।

 

बरसे रिमझिम पानी बरसात में मन को भिगोती,  

तन को झूमाती ठंडी-ठंडी बयार बरस रही।

 

ये बादलो, इतना न बरसो कि आ न सके कभी,  

आ जाए वो इतना बरसो कि जा न सके कभी।

 

नीलम प्रभा सिन्हा

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