
विषय:- लहू में देशभक्ति
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लहू में देशभक्ति,सभी में जरूरी है
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लहू में देशभक्ति की,कमी से हमने,
झेले हजारों वर्ष,मुगलों की गुलामी।
लहू में देशभक्ति,रखने वाले सपूत,
झेलें यातना और,कैद में गुमनामी।।
लहू में देशभक्ति की,कमी से हमने,
झेले दो सौ वर्ष,अंग्रेजों की गुलामी।
लहू में देशभक्ति,रखें जो देश भक्त,
कुर्बानी को आज भी ,देते हैं सलामी।।
लहू में देशभक्ति की,कमी से हमने,
राष्ट्र के भीतर,अलगाव वाद लाया।
लहू में देशभक्ति,रखने वाले सिपाही,
सीमा की रक्षा कर,राष्ट्रवाद लाया।।
लहू में देशभक्ति,रखने वाले जाॅंबाज,
दुश्मनों को,शौर्य-साहस दिखाते हैं।
महफूज़ रखते हैं, मादरेवतन और,
सीमाओं में भी वे,तिरंगा लहराते हैं।।
लहू में देशभक्ति, नहीं जिनके जिगर,
राष्ट्रद्रोही-भ्रष्टाचारी, दीमक बनते हैं।
अलगाववाद-मावोवाद, शरण पाते,
राष्ट्र अस्मिता पर,वे खतरा बनते हैं।।
लहू में देशभक्ति,विकसित होते ही,
सम्पूर्ण भारत,विकासशील बना है।
लहू में देशभक्ति,कायम रखेंगे तभी,
भारत की तरक्की,होगी चौगुना है।।
लहू में देशभक्ति,यही तो हराष्ट्र धर्म ,
धर्म पालन करते, बनें सच्चे सपूत।
भारत माता के किरीट,दमकते हुए,
लहू में देशभक्ति से, बनेंगे अग्रदूत।।
लहू में देशभक्ति,ये कर्तव्य है हमारे,
लहू में देशभक्ति,ये कहाॅं मजबूरी है।
खुशहाल राष्ट्र,बनाना चाहते है तब
लहू में देशभक्ति,सभी में जरूरी है।
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स्वरचित मौलिक रचना संग
सुरेश कुमार बन्छोर “अभ्यर्थी”
हथखोज/ देमार (पाटन)
तालपुरी भिलाई छत्तीसगढ़
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