E-Paperसाहित्य रचना

शीर्षक: गुरु ओंकार

शीर्षक: गुरु ओंकार

_डॉ. अंजली सामंत_

 

गुरु और शिष्य का संबंध ही ओंकार है।  

यह भारतीय संस्कृति का मूल आधार है।  

गुरु अक्षय ज्ञान-भंडार देते हैं,  

और शिष्यों के पंखों में उड़ान का बल भरते हैं॥1॥

 

ज्ञान से शिष्यों की झोली भर देते हैं।  

श्रीगुरु के चरणों में माँ सरस्वती का वास होता है।  

गुरु की आँखों से स्नेह की धारा बहती है।  

गुरु साक्षात कल्पवृक्ष के समान होते हैं॥2॥

 

गुरु शिष्यों को ज्ञान से तृप्त करते हैं।  

घोंसला छोड़कर उड़ गए पक्षियों के 

 प्रगति की चिंता करते हैं।  

उनका आशीर्वाद का हाथ सदा सिर पर रहता है।  

कछ वे की तरह दूर से ही रक्षा करते हैं॥3॥

 

विज्ञान और तकनीक के इस युग में भी  

गुरु का स्थान अतुलनीय है।  

भारत के लोग गुरु को  

ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर के समान मानते हैं॥4॥

 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also
Close
Back to top button
error: Content is protected !!