E-Paperसाहित्य रचना
शीर्षक: आह

शीर्षक: आह
वेदना के तार को तुम
मत ही छेड़ो बार बार
घायल हो जाती है
मेरे प्राण बार
सोई हुई है वेदना
जो लुप्त हो चुकी है दिल में
गड़े मुर्दे उखाड़ने से
क्या होगा फायदा तुम्हें
रूह कांप जाती है
जब याद आती है
कितनी हृदय बातें
वो दहशत भरी रातें
वो तड़पती आहें
जब अपने ही
नजर आने लगे बेगाने
रह रह कर
वह जाती बातें
सुनना नहीं किसी की बातें
क्या सच है क्या झूठ
इस जग में पल पल
बदलते हैं रूप
दुनिया की फुन फुन बातें
क्या मिल तुम्हें सता के
वेदना के तार को तुम
मत ही छेड़ो बार-बार
घायल हो जाते हैं
मेरे प्राण
नीलम प्रभा सिन्हा



