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शीर्षक- बरसो रे बदरा 

 

शीर्षक- बरसो रे बदरा 

 

घिर आए मेघ गगन में,हरित धरा फिर मुस्काई।

दामिनि चमकी नभ में,शीतल बयार सुहाई॥

 

कोयल बोले आम्र-डाल पर,मोर नृत्य दिखाएँ।

रिमझिम बूँदें पड़े धरा पर,पुलकित जन हो जाएँ॥

 

घर-घर पूए,घेवर,खीर,मीठी महक लुटाएँ।

तीज सजे,झूले अमराई,सखियाँ कजरी गाएँ॥

 

मेहँदी रचे कोमल हथेली,चूड़ियाँ मधुर छनकें।

हँसता सावन गाँव-गाँव में,मंगल-गीत झनकें॥

 

सास अकेली द्वार निहारे,बहू पीहर से आए।

पिया तो उसके परदेस बसे हैं,कैसे आना हो पाए॥

 

नैन बिछाए बैठी सजनी,पंथ निहारती जाए।

पाती लिख भेजे पिय को,उत्तर कोई न आए॥

 

काली घटा! पिया से कह,अब शीघ्र आना।

विरह-व्यथा बहुत बढ़ी,मन दर्शन को दीवाना॥

 

बरसो प्रेम-सुधा बन बदरा,मिलन पुष्प खिल जाएँ।

प्रिय के संग हँसे सुहागिन,सारे स्वप्न सज जाएँ॥

मंजूषा दुग्गल

शिक्षिका/ कवयित्री/ लेखिका 

करनाल (हरियाणा)

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