
शीर्षक:–सावन के गीत
बदरा रे तु काहे न बरसे
बीता आषाढ़ सावन आये
फिर भी तु न बरसे।
उमड़ घुमड़ घिर घिर आयें
काली घटा नभ मे छायें
दिखा झलक मन तरसायें
दूर पवन तुझे उड़ा ले जायें
तु न बरसे तु न बरसे
बदरा रे तु काहे न बरसे।।
मै प्यासी ये मन तरसे
जिगर में पड़ गई दरारें
इंद्रधनुष नहीं अंबर मे
सूखी नदियाँ सूखी तालाबें
सावन की हरियाली न दिखें
कृषक पल पल रोयें
तु काहे न बरसे
बदरा रे तु काहें न बरसे।।
सावन के गीत न गायें
पड़े न घरों में कोई झूलें।
गर्मी ने बेहाल किया
बारिश ने हैरान किया
तु न बरसे जीवन तड़पे
बदरा रे तु काहे न बरसे।।
स्वरचित:–डॉ अनुपम भारद्वाज मिश्रा




