
(एक कहानी)
वो गिलहरी के तीन बच्चे:
एक बार की बात है एक शिष्य ने अपने गुरुजी से पूछा कि गुरुजी की अगर हमारा मन, हमारा अपना होता है तो वह हमारी क्यों नहीं सुन रहा होता है? क्यों हमें उसे बार-बार यह बताना पड़ रहा होता है कि ध्यान दो, सुनो मुझे। गुरुजी उस वक्त तो चुप रहे।
उन्हीं दिनों एक गिलहरी जल्दी ही मां बनी थी और उसने तीन बच्चों को जन्म दिया था।
पर एक दिन की अनहोनी में उस मां गिलहरी को एक बिल्ली ने खा लिया और अब उसके सभी नवजात बच्चे अनाथ हो चुके थे।
गुरुजी से यह सब देखा नहीं गया और फिर वह उन तीनों नवजात बच्चों को अपने उस कक्ष में ले आए जहां वह और उनके सभी शिष्य ध्यान-साधना इत्यादि किया करते क्योंकि वहां पहले से ही एक पिंजरा था इसलिए उन्होंने उन तीनों को उसमें बंद कर दिया और समय-2 पर उनके खाने-पीने की व्यवस्था भी कर दी।
एक दिन जब गुरु जी और उनके सभी शिष्य ध्यान मुद्रा में बैठे हुए थे कि तभी बिल्ली की म्याऊ-म्याऊं की आवाज आई और यह पाया गया कि वह बिल्ली धीरे-धीरे पिंजरे की ओर बढ़ रही है और उसे देखकर गिलहरी के तीनों नवजात बच्चे पिंजरे से बाहर निकल रहे हैं।
गुरुजी ने जैसे ही यह देखा वह तुरंत गए और उन्होंने गिलहरी के तीनों बच्चों को पिंजरे में वापस डाला और दरवाजे को कसकर बंद कर दिया और साथ ही साथ बिल्ली को भी वहां से भगा दिया।
इसके बाद गुरुजी अपने उसी शिष्य के पास गए जिसने मन से जुड़ा हुआ वह प्रश्न उनसे किया था और कहने लगे कि देखा आपने जब तक इन बच्चों में परिपक्वता नहीं आ जाती तब तक यह ऐसे ही बाहर निकालते रहेंगे और हमें इन्हें अंदर करते रहना होगा और जिस दिन से इनमें परिपक्वता आ जाएगी उस दिन से यह स्वयं ही अंदर रहने लग जाएंगे।
ठीक ऐसा ही हमारे मन के साथ होता है और हमारे ध्यान के साथ भी। वह ज्यादातर बाहरी सुख को पाने की खोज में भटकता रहता है और यह भूल जाता है कि वास्तविक सुख, वास्तविक शांति तो आपके अंदर ही है।
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कि जिस दिन से आप अपनी दैनिक खुशी को खुद से और खुद में ही ढूंढने लग जाएंगे ठीक उसी दिन से आप ज्यादा सकारात्मक, ज्यादा ऊर्जावान और ज्यादा खुश महसूस करेंगे।
~ज्योति (स्वलिखित)
शिक्षिका शिक्षक प्रशिक्षु एवं ट्यूटर
नागपुर,महाराष्ट्र।




