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शीर्षक “उस पार न जाने क्या होगा।

शीर्षक “उस पार न जाने क्या होगा।”

उस पार न जाने क्या होगा

चाँद उदित हो कर नभ में,

कुछ ताप मिटाता जीवन का।

लहरा लहरा कर ये शाखाएं भी,

कुछ सोख मिटा देती मन का।

कल मुमूर्झाने वाली कलियां भी,

कहती है मगन रहो मगन रहो।

बुलबुल भी गान सुना कर कहती,

मदमस्त रहो-मदमस्त रहो।

उस पार मुझे बहलाने का,

उपचार ना जाने क्या होगा।

ऐसा सुनता उस पार प्रिय,

ये सब साधन भी छिन जायेंगे।

तब मानव का चेतनता का,

आधार न जाने क्या होगा।

कह तो सकते हैं कह कर भी,

कुछ दिल हल्का कर लेते हैं।

उस पार अभागे मानव का,

अधिकार ना जाने क्या होगा।

अब तो हम अपने इस जीवन के,

क्रूर कठिन को कोस चुके।

उस पार नियति का मानव से,

व्यवहार ना जाने कैसा होगा।

— नीलम प्रभा

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