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साहित्य जगत के महान हस्ती

"मुंशी प्रेम चंद" जयंती विशेष

साहित्य जगत के महान हस्ती

“मुंशी प्रेम चंद” जयंती विशेष

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१४६ वीं जयंती पर,साहित्य सम्राट को नमन।

निर्भिक,ज्वलंत सार्थक,साहित्य परोसा चमन।।

“कालजयी रचनाकार का, प्रस्तुत किया सबूत।”

“श्रेष्ठ समाज सुधारक,माँ भारती के सच्चे सपूत।।”

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    १९१८ से १९३६‌ ‘प्रेमचंद युग’ खिला है

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इकत्तीस जुलाई,अठारह सौ अस्सी को वे,

धनपत राय श्रीवास्तव,के घर जन्म लिए। 

ग्राम लमही, बनारस वाले,आठ अक्टूबर , 

उन्नीस सौ छत्तीस,जहाॅं से हैं निर्वाण लिए।। 

 

बिता है बचपन, आभाव में विलक्षण का, 

तेरह वर्ष में ही लिखा,नाटक व उपन्यास। 

पंद्रह वर्ष में ब्याह,हो गया था जिनका जी, 

पत्नी सुंदर पर बेमेल,करतीं थीं अट्हास।। 

 

छुटपन माँ आनन्दी देवी,स्वर्ग सिधारी हैं, 

पिता अजायबराय ने,की थी दूजी शादी।

मातृस्वसा पधारी,घर आंगन में तभी से, 

जरा भी नहीं हुई जी,ममता की मुनादी।। 

 

पिता चल बसे फिर,कांधे पर पड़ा बोझ,

परिवार चलाने,साहित्य रचा फिर ओज।।

उपन्यास सम्राट,सेवासदन से डेढ़ दर्जन, 

कफ़न प्रेमचंद के,फिर कथासंग्रह खोज।। 

 

व्यक्ति,परिवार,समाज,राष्ट्र,विश्व पर लिखे, 

अनगिनत भाषण,संपादकीय के भी लेख।

सेवासदन,प्रेमाश्रम,रंगभूमि,गबन संग ही,

निर्मला,कर्मभूमि, गोदान, मंगलसूत्र एक।। 

 

सिनेमा मजदूर,बाजार ए हुस्न, सेवासदन,

शतरंज के खिलाड़ी,सदगति,गोदान,गबन, 

उपन्यास पर थे,कहानियों पर बनी सिनेमा, 

पंच परमेश्वर और रचे, गुल्ली डंडा समान।। 

 

जीवन के छप्पन बसंत,में ही हुए वे महान, 

सटीक,खड़े,सीधे शब्द,रहे उनकी पहचान, 

प्रतिबंधित मूल उन्हें, प्रेमचंद नाम मिला है, 

१९१८ से १९३६‌ में ‘प्रेमचंद ‌युग’ खिला है।। 

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स्वरचित मौलिक रचना संग

सुरेश कुमार बन्छोर “अभ्यर्थी”

हथखोज / देमार (पाटन)

तालपुरी भिलाई छत्तीसगढ़

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