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आनन्द 

आनन्द 

आनन्द मुझ आत्मा का

श्रेष्ठ गुण है,

जो सदा मन को एकाग्र 

प्रफुल्लित रखता है।

 

मन आत्मा का परम साथी 

आदेश पर चलता है।

अंतर्मन से जुड़कर अपनी 

शक्ति समझना है।

 

भौतिकता के पीछे निरन्तर 

दौड़ रहा है 

क्षणिक बाह्य रमणिकता में 

स्थाई गुण विस्मृत है।

 

आनन्द के चिर परिचित 

आंगन में,

कमियों को स्वीकार कर

हर क्षण हर्षित रहे।

 

उम्मीदों के उजाले में 

मुस्कुराते रहे,

ज्ञान योग की धारणा से

आत्मज्ञान बढ़ातें रहे।

 

आनन्द की अनुभूतियों से

सदा स्वस्थ रहे,

स्वाध्याय मनन चिंतन से

प्रकृति के जुड़े रहे।‍‌

 

आनन्द से ही आनन्द मिले

अंतर शक्ति जाने,

आत्म विकास का जरिया ये

मन निर्मल रहे।

 

अमिता मराठे 

इंदौर मध्य-प्रदेश

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