
नमन मंच
दिनांक 15.7.26
शीर्षक
सपनों का संसार
सृष्टि के इस अविनाशी चक्र में,
सपनों का फैला है संसार।
सतयुग, त्रेता तक था जहाँ
धर्म, सत्य और प्रेम का पावन राज्य।
द्वापर से कलियुग तक आते-आते
फैल गया माया का साम्राज्य।
भटक रहा है देखो इंसान,
भूल गया अपना सच्चा निवास।
माया-मोह में ऐसा उलझा,
ज्यों मृग मरीचिका के समान।
भक्ति की गहन अंधियारी रातों में
ज्ञान का उजियारा हुआ अनजान।
माया-मोह में ऐसा फँसा,
भूल गया अपना अस्तित्व।
पुरुष-प्रकृति के इस अद्भुत खेल में
खो बैठा जीवन का सत्य।
भाग रहा है धन-दौलत के पीछे,
तृष्णा का नहीं कहीं अवसान।
अल्पकाल की इस जीवन-यात्रा में
सब कुछ रह जाएगा यहीं धरा पर,
फिर किस बात का इतना अभिमान?
माया का मोहक जाल बिछा है,
सजा लिया उसमें सपनों का संसार।
अब समय हमें पुकार रहा है—
माया के दलदल से बाहर निकल,
कर ले अपने ‘स्व’ का साक्षात्कार।
यही है जीवन का परम सत्य,
यही मुक्ति का है आधार।
माया के बन्धन तोड़ मनुष्य,
पा ले आत्मा का अमृत-संसार।
परमात्मा की वाणी गूंज रही है
सुनकर कर ले अपना जीवन सार्थक।
विश्व परिवर्तन की इस शुभ वेला पर।
स्वाहा होगा माया मोह का संसार।
पत्थर बुद्धि से पारस बुद्धि बनना यही कर्तव्य है आज।
अमिता मराठे
इंदौर मध्य-प्रदेश




