E-Paperसाहित्य रचना
कर ले ज्ञान श्रृंगार

कर ले ज्ञान श्रृंगार
सत्य की पहचान कर लें
प्यार लुटाता उसे देख ले।
स्नेह से उसका स्मरण कर ले
प्रेम से मीठी बातें कर लें।
हे मन ज्ञान श्रृंगार कर लें
बगिया के पुष्प महकने लगे
प्रभू का दिल से दीदार कर लें।
करना अंतर्मन से स्वागत
सत्यं शिवम् सुनदम् कह लें।
हे मन ज्ञान श्रृंगार कर लें।
ज्ञान की नित्य लोरी सुन ले
प्रभू की झलक पाने के लिए।
तरस रहा हूं नित्य निशी दिन
शान्ति का गहन आभास पा लें।
हे मन ज्ञान श्रृंगार कर लें।
मन-ही-मन बातें कर ले
रूठ जाये तू प्यार से मना ले।
कभी ना वंचित रहूं तुझसे
करावनहार को दिल में बसा ले।
हे मन ज्ञान श्रृंगार कर लें।
कमल समान जीवन सजा लें
सुख-दुख में सम भाव रख लें।
गलत मार्ग पर कभी ना चलना
दैवी गुणों की धारणा कर लें।
हे मन ज्ञान श्रृंगार कर लें।
अमिता मराठे
लेखिका एवं समाज सेविका
इंदौर मध्य-प्रदेश



