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शीतल हवाओं में काव्य की गूँज

 

शीतल हवाओं में काव्य की गूँज

शीतल हवाओं का मधुर स्पर्श,
मन वीणा छेड़े कोमल हर्ष।
पत्तों की सरसर में लय है,
जैसे कविता खुद चल रही है।

नील गगन की चुप मुस्कान,
चाँद सुनाए मन की तान।
शब्द स्वयं बन जाते गीत,
जब बहती शांति, बहती प्रीत।

ओस कणों में झिलमिल भाव,
धरती गाए नव-नव राग।
श्वासों में बसती है छंद,
ताल-बद्ध हो जाता अंतर्मन।

हवाओं संग उड़ते विचार,
काग़ज़ पाता सृजन-संस्कार।
शीतल पवन की यही पुकार—
काव्य ही जीवन, जीवन आधार।

कलम थामे जब मौन पुकारे,
हृदय-सरोवर शब्द उतारे।
शीतल बयार सिखाए यही—
सत्य, सौंदर्य, प्रेम निखारे।

स्वरचित
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार
क्रमांक 2070

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