जनता की ख़ामोश चीख़

“जनता की ख़ामोश चीख़”
वे जो लोग सत्ता में बैठे हैं,कभी झोपड़ियों में आकर देखिये ।जिन हाथों से देश चलता है,उन हाथों के घाव देखिये…
न जाने कितने वादे हवा में उड़ गए??कितने सपने मिट्टी में मिल गए?जिन आँखों ने बेहतर कल माँगा था,वो आज इंतज़ार करते-करते थक गए।
कागज़ों पर सब बदल गया,हर पन्ने पर तरक्की लिखी है।पर गलियों में खड़े इंसान की,अब भी वही पुरानी पीड़ा दिखी है।
जिसने खेतों में अन्न उगाया,उसके घर में चूल्हा रोता है।जिसने शहरों को रोशनी दी,वही अँधेरों में सोता है।
सत्ता के गलियारों में अक्सर,आवाज़ें खो जाती हैं।गरीब की सच्ची फरियादें,फाइलों में सो जाती हैं।
पर याद रखना ऐ सत्ता में बैठे लोगों ,जनता सिर्फ एक भीड़ नहीं होती।उसकी आँखों में इतिहास होता है,उसकी चुप्पी भी बेआवाज़ नहीं होती।
एक दिन सवाल उठेंगे फिर से,हर दर्द का हिसाब होगा।जिस राज में इंसान रोया है,उस राज से जवाब होगा।
क्योंकि कुर्सियाँ बदल जाती हैं,नाम भी मिट जाते हैं।पर जिन दिलों पर ज़ख्म लिखे हों,वो किस्से इतिहास बन जाते हैं।
नाम – ललिता डोभाल ‘प्रज्ञा ‘
पता – बड़कोट,, उत्तरकाशी (उत्तराखंड )




