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सूरज से दमकते रहो:–

सूरज से दमकते रहो:—

 

शुभम, शीतल, सकाश लिए, चन्दा से चमकते रहो।

ओज,ओजस,आभास लिए, सूरज से दमकते रहो।

                        

सुमधुर-सरस-सुर-सागर में,नित्य हिलोरे लेते रहो।

गोविन्द की गायी गीता के, आनन्द में विभोर होते रहो।

गीतांजली-गौरव-गान गाओ, चिड़ियों से चहको तुम।

सुरभित,सौरभ,सुगंध लिए, फूलों से महकते रहो।

                           

जीव ,जगत, जिन्दगी में, प्रतिदिन आगे बढ़ते रहो।

उन्नति के उतुंग अद्रि तक, नई सीढ़ियाँ चढ़ते रहो।

आनंद के अखुट अम्बर में, अनिल से उड़ान भरो तुम।

अवनि के अविचल अंचल पर, अनवरत चलते रहो।

                          

भव-भविष्य भावमय बीते, भ्रमर से गुनगुनाते रहो।

वृहद,वृंद,विषय-विश्व में, विहग समान विचरते रहो।

वन,बीहड़,विपट, विपिन में, निश्कंटक सिमटो तुम।

हर हर्ष, हार, विहार में, सदा उन्मुक्त थिरकते रहो।

 

सुभाषिनी जोशी ‘सुलभ’

इन्दौर मध्यप्रदेश

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