
18/9/25
मेरे गुरु
मेरे पिता
मानती हूं मैं भी की
पिता दिए की बाती है
उस बाती को जलने को
जिन्दगी भी होनी चाहिए ।
जब बाती जल ना सके
तेल डालने को दिया न हो
फिर बस में क्या होय
उस बाती की याद में जिए ।
वो उजियारा महसूस करे
उन्ही से मिला प्यार है
ज़िंदगी का एहसास
यादों में सुकून भी उन्हीं से ।
सुख ही सुख मिला उन्ही से
यादें तमाम है ताज़ा उन्ही से
विरह में शामिल वेदना भी
सारा कुछ मिला उन्हीं से ।
ज्ञान , संस्कार और संगीत
आज तक चलता है उन्हीं से
जो भी मुझे देकर गए
सारी खुशियां ताजा उन्हीं से ।
हर सांस में शामिल वो है
हर धड़कन चलती उन्हीं से
एक पल भी ऐसा नहीं
जो उनकी याद भुला दे ।
वो लगते मुझे वटवृक्ष से
छांव भी मिली उन्हीं से
उनके बिन ज़िंदगी की
तुलना करो रेगिस्तान से ।
आसमान में बादल पर
उड़ती फिरती में उन्हीं से
आखिर साथ छूट गया
धड़ाम से गिर गई जमी पे ।
अब सोचती हूं अच्छा हुआ
वो जो चले गए जहां से
दुखी हो कर रह जाते
देख मेरा नाता ज़िंदगी से ।
नहीं उम्मीद अब जिंदगी से
और ना उल्लास , उमंगे है
मौत गले नहीं लगाती
जिंदा होने का सिर्फ़ आभास है ।
कवयित्री समाजसेविका
डॉ अर्चना पंडित
इन्दौर




