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शक्तिमान

शक्तिमान
तिल तिल कर
जलाया मुझको,
और कहते हो
क्या मैंने किया?
वाह रे वाह!
तेरी लेख,
प्रतिदिन निराली
होती जाती।
जैसे चाहे, वैसे नचाए,
एक पल हँसाए,
एक पल रुलाए।
बस में नहीं
कुछ भी मेरे,
केवल मर्ज़ी
तेरी अपनी।
पर मानव कहता
“मैंने यह किया।”
मानव सोचता,
पल-पल मेरे
कठिन परिश्रम से ही
मुझको
मिली जग में ख्याति।
पर सच यही
तू ही है जो
हर समय
करने के लिए
करता प्रेरित।
तब जाकर
मिलती ख्याति,
मिलता नाम।
अपना नाम
कभी बदनाम
न करता तू।
इस जग में
सब कुछ
मानव के हाथों
करवाता रहता।
अर्थ भी,
अनर्थ भी;
एक पल अच्छा,
एक पल बुरा।
उसने उसको मारा,
मैंने उसको फँसाया
पर सच क्या?
तूने ही सबको
किया प्रेरित।
तिल-तिल कर
जलाया मुझको,
और कहते हो
क्या मैंने किया?
— नीलम प्रभा सिन्हा




