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हृदय की प्रवाह

04/08/26, मंगलवार
हृदय की प्रवाह
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घर छोड़ कर बाहर जाते हो मंदिर प्राणी,
अपना पवित्र भाव दिखाने…..
घर के मंदिर में एक बार भी नतमस्तक कर जोड़ तो प्राणी,
आते उत्तम विचार…
घर भी तो एक मंदिर जैसा
दिखाते तुम अपना सच्चा सद् व्यवहार…
माता पिता से कटु बातें करते हो हजार…
और तीर्थ में चढ़ाते फुल , नैवेद्य हार…
विडम्बना तो देखो तुम प्राणी….
माता पिता को पानी नहीं पुछे
शिवशंकर को चढ़ाते दूध का धार…
बार-बार कर जोड़ देवों के समक्ष प्रार्थना जो करते…
माता पिता को देखना नहीं चाहते….
ये कैसा दिखावा है प्राणी…
व्यवहार या तिरस्कार…
तुम हृदय पर रखकर हाथ देखो….
क्या मिल रहा है तीर्थातन से
पाप धोकर पुण्य
का ….पुष्पहार..?
✍🏻श्यामा प्रभाकर दास
मुम्बई



