मिट्टी की महक

मिट्टी की महक
ना कोई इत्र, ना कोई फूल ना ही कोई चंदन में,
ये खुशबू ,पहली बूंद व भींगे
मिट्टी की मिलन में।
जब आसमान रोता है, धरती
भींग कर चहकती है,
और हवा में घुल जाती है तो सौंधी खुशबू महकती है।
ये महक किसी महल में नहीं केवल धरती पर मिलती,
ये झोपड़ी के आंगन में, खुशी खुशी होकर पलती ।
किसान के हल,मेहनत के फल, मजदूर की थाली में,
माँ के सने हुए हाथों की,प्यार भरी खुशहाली में।
मजदूर का श्रम,किसान के पसीने की कहानी,
बीज से पौधे, पौधे से रोटी तक की रवानी।
बचपन की कच्ची गलियां, नंगे पैर की निशानी होती,
कच्ची मिट्टी की मकान बीच में,तुलसी चौरा सुहानी होती।
लाखों इमारत,महल बना लो, चैन नहीं आता दिल को,
जब तक बरसात की भींगी मिट्टी की खुश्बू में न भींग लो।
इसी मिट्टी ने हमें पाला, रोटी
दी, पानी भी दिया,
इसी में खेलकर बड़े हुए,इसी
की गोद ने सुकून दिया।
चन्द्रकला शर्मा
प्रधान पाठक
बेमेतरा छत्तीसगढ़




