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बरसा रानी

बरसा रानी

बरसो बरखा रानी, बरसो।

तप्त धरती पुकारे।

पुकारे जन-मानस,

पुकारे पक्षी-वृंद सारे।

 

बरसो बरखा रानी, बरसो।

सूरज की प्रचंड तपन से

धरती आग उगलती,

त्राहि-त्राहि मची।

 

बूँद-बूँद पानी को

तड़प रहे सब प्राणी।

मूक पशु-पक्षी तरस रहे,

पेड़-पौधे मुरझाए।

 

बरसो बरखा रानी, बरसो।

 

खेत-खलिहान सूखे पड़े,

किसानों की आस।

नज़रें तुझ पर टिकी हुईं,

पूरी कर उनकी प्यास।

 

बरसो बरखा रानी, बरसो।

 

छोटे-छोटे बच्चे भी

कुम्हला रहे हैं आज।

इन पर भी कृपा कर दो,

बरसा दो सुख-साज।

 

बरसो बरखा रानी, बरसो।

 

बादल बिन मोरनी भी

व्याकुल होकर डोले।

नाचने को है व्यग्र खड़ी,

कब घिर आएँ मेघ भोले।

 

बरसो बरखा रानी, बरसो।

 

तप्त धरती पुकारे,

पुकारे जन-मानस।

जीवन में फिर हरियाली भर दो,

बरसो बरखा रानी, बरसो।

 

— नीलम प्रभा सिन्हा

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