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साहित्यिक समाचार

 

“गौ माता मौन करुणा”

 

आँगन में जब वह धीरे-धीरे आती है,

सूखी आँखों में भी ममता झलक जाती है।

ना कुछ कहती, ना कोई शिकायत करती,

बस चुपचाप दर्द अपने भीतर ही भरती।

जिसने कभी अपना कुछ भी नहीं माँगा,

फिर भी हर घर को अपना ही माना।

दो रोटी में भी वह खुश हो जाती है,

भूखी रहकर भी आशीष दे जाती है।

उसकी आँखों में एक सवाल छिपा है,

“क्यों इंसान इतना बदल गया है भला?”

जिसने बचपन से तुझे दूध पिलाया,

आज उसी को तूने सड़कों पर भटकाया।

कभी मंदिरों में उसका रूप सजाया,

आज कूड़े में उसका जीवन गँवाया।

यह कैसी इंसानियत, कैसा व्यवहार,

माँ को ही कर दिया तूने लाचार।

एक बार उसकी आँखों में झाँक कर देखो,

अपने ही कर्मों से खुद को आँक कर देखो।

वह रोती नहीं, पर दर्द बहुत सहती है,

गौ माता है… हर पल ममता ही देती है।

आओ मिलकर यह प्रण आज उठाएँ,

गौ माता को फिर से सम्मान दिलाएँ।

जिस घर में वह प्रेम से बस जाती है,

वहाँ खुद भगवान भी मुस्कुराते हैं।

अगर चाहो तो मैं इसी पर छोटी, बड़ी या मंच पर सुनाने वाली कविता भी बना सकता हूँ।

 

स्वरचित/ मौलिक 

राजलक्ष्मी श्रीवास्तव 

जगदलपुर राजिम 

छत्तीसगढ़

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