Uncategorized

साहित्य समाचार

 

क्या दूरियाँ दिलों को तोड़ देती हैं?

लेखिका: मनीषा कुमारी

 

क्या दूरियाँ सच में दिलों को तोड़ देती हैं,

या यह सवाल ही हमारी अपनी पहचान बन जाता है?

 

क्या किसी अपने के दूर हो जाने से

दिल में उसके लिए प्यार कम हो जाता है?

 

चाहे वह माँ का अपने बच्चे से प्यार हो,

पत्नी का अपने पति से,

या प्रेमिका का अपने प्रेमी से—

क्या दूरी इन रिश्तों को खत्म कर देती है?

 

यह केवल एक सवाल नहीं,

बल्कि कई गहरे अर्थों को अपने भीतर समेटे हुए है।

 

सच तो यह है कि दूरियाँ

दिल के रिश्तों को तोड़ती नहीं,

बल्कि कई बार उन्हें और भी करीब ले आती हैं।

 

जहाँ मिलने की चाहत, तड़प और बेचैनी होती है,

वहीं प्रेम और गहरा होता चला जाता है।

 

कभी-कभी इंतज़ार में दिल टूटता भी है,

पर जब वही दिल अपने प्रिय से मिलता है,

तो हर दर्द, हर शिकायत भूल जाता है।

 

वियोग के क्षण, जैसे नागमती का विरह,

दिल के टूटने की पीड़ा को दर्शाते हैं,

पर मिलन का सुख उसी पीड़ा को

अनमोल आनंद में बदल देता है।

 

जब दिल से दिल मिलता है,

तो एक ऐसी अनुभूति जन्म लेती है

जो आत्मा की गहराइयों को छू जाती है।

 

यह केवल प्रेम नहीं,

बल्कि एक आध्यात्मिक जुड़ाव भी है,

जिसे हम एक अलग ही रूप में महसूस करते हैं।

 

इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि

सच्चे रिश्ते दूरियों से टूटते नहीं हैं,

वे तो और भी मजबूत हो जाते हैं।

 

हाँ, कभी-कभी हम निराश हो जाते हैं,

और हमें लगता है कि रिश्ता कहीं टूट तो नहीं रहा,

पर जो रिश्ते दिल से बने होते हैं,

उन्हें कोई दूरी कभी तोड़ नहीं सकती।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!