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“नारी शक्ति”

“नारी शक्ति”

 

नारी कोमल हाथों से समय में, झूला भी झुलाती है,  

जरूरत पड़े तो नारी एक दिन तूफान भी बन जाती है।  

 

आंसू पोंछ कर सबके हिम्मत, हौसला बढ़ाती है,  

टूटे सपनों को जोड़कर आगे बढ़ती जाती है।

 

रसोई की गर्मी में रहकर अपने परिवार को पालती है,  

बाहर के कार्यों में सफल वो काम कर जाती है। 

 

बेटी रुप में घर की लक्ष्मी बनकर खुशियां लाती है,  

मां बनकर संस्कारों की नींव से ज्घर को सजाती है।

 

उसकी चूड़ियों की खनक में संघर्ष भरा हुआ है,  

उसके पल्लू की छांव में ममता छिपा हुआ है। 

 

किसी भी रुप में हर काम करके दिखाने का नाम है।

सहनशीलता, अपनापन, दयालु उसकी पहचान है।

  

अन्याय अत्याचार भी एक सीमा तक ही सह पाती है, 

वरना दुर्गा ,काली और कंकाली भी बन जाती है।

  

घर का विकास तभी होता जब  

नारी का सम्मान है,  

वहां हर घर में उजाला और प्रगति का होता गान है।

 

  चन्द्रकला शर्मा 

   प्रधान पाठक 

बेमेतरा छत्तीसगढ़

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