शीर्षक – बस धीरज का छोर न छूटे

शीर्षक – बस धीरज का छोर न छूटे
टूटे जब सपनों के पंख,
मौन हो जाए जीवन रंग।
आंखों से जब नीले भी फूटे,
बस धीरज का छोर न छूटे।
पर अनजाना,बोझ बहुत है ,
हर कदम पर कोई युद्ध है।
भीतर का साहस न रूठे,
बस धीरज का छोर न छूटे।
हार लिखें जो आज कहानी,
कल वहीं बने जीत की वाणी।
विश्वास की डोर न टूटे,
बस धीरज का छोर न छूटे।
काटें भरे ही राह भले ही,
पग पग पर अग्नि परीक्षा।
सीने में विश्वास यही है,
हाल न माने देश की रक्षा।
तक कर बैठे याद करें,
चलते रहना ही धर्म रहें।
जीवन से अब अर्थ भी रूठे,
बस धीरज का छोर न छूटे।
संसार बड़ा ही अजीब है,
हंसी के पीछे आसूं छिपे।
हर चेहरा कुछ करीब है,
कभी धूप बहुत जलाती है।
कभी छाया भी रूठ जाती।
अपने भी जब बन जाते पराये,
पीड़ा चुपके चुपके आती।
न्याय यहां अक्सर सोता है,
सच को राह न मिल पाती।
फिर भी मन का दीप जलाए,
हर रात के बाद सवेरा है।
यही मंत्र है जीवन धारा का,
बस धीरज का छोर न छूटे।
@ राजलक्ष्मी अग्रवाल, गुवाहाटी।

