अलाव

अलाव
शिशिर की खुशनुमा मौसम है,
चिड़चिड़ाती ठंड,
कुहरे की झीनी चादर
चौपाल पर मुस्कानों की आग अलाव।रूह कंप कंपा जाती है,
हल्की ठंडी ठंडी हवाएं
कानों में गुनगूनाती एक मीठी पुकार।उड़ उड़ के चिंगारी की तरह
एक स्वप्न पहुंच जाती,
शिशिर बने है हिमकण,
अलाव की आंच सिमटती।
ठिठुरी रातें,
ठिठुरी दिन।
फसल कटाई और नई शुरुआत
जश्न में अलाव जलाए,
दादी की कहानियां,
बच्चों को भावनात्मक सूरक्षा
जैसे आग की गर्मी।सर्दी का मौसम,
इंसान अलाव पर आग की
और हाथ फैलाए,
सुनने किस्से, कहानियां
चाहें कितना ही गरीब क्यों न हो।
लोगों दिन में अपने हिस्से का सूरज,
रात को अपने हिस्से की अलाव मिल जाती।
आग और बुजुर्ग अलाव के पास,
बच्चे इधर से उधर
और उधर से इधर।
आग में आलू, शकरकंद दबाई जाती।हिमालय की चौकियों से लेकर
विशाल मैदानों तक मनुष्य का जीवन पनप गया।
अलाव,आग से दोस्ती
शाम हुई जम गये चिलम – अलाव,
अलाव में प्यार है,
ममता है,जलता है
वो मुस्कुरता है।अलाव की आग बिना अधूरी है
सर्दियां,
सर्दी में गठरी बने लोग ,
गर्माहट भरी उम्मीद में
दुनिया की हर कोने में
हर संस्कृति में मौजूद है सूखी
लकड़ियां अलाव,
सूखे पत्ते और चिंगारी अलाव
संघर्ष का हौसला,
हिम्मत और सहयोग
जीवन में कुछ बड़ा हासिल होता है
अलाव में अपना कुछ नहीं,
आग कभी स्थिर नहीं होती।वो सुलगती है, जलती है
तेज होती है।जिंदगी की सफर में जैसे
उतार चढ़ाव है।
कभी निराशा का धुआं
अंधा बना देता है।गांव की संस्कृति और अलाव
का गहरा रिश्ता है।
प्रकृति की करीब
सरल , धीमी रफ्तार
लाहड़ी,बिहु, होली
त्योहार पर
अलाव जलाए जाते।
अलाव और रिश्ते दोनों ही
गर्मी जुड़ाव है।
अलाव की गर्मी में छिपा है इतिहास,
एक गहरा राज।
अलाव सभी को जुटाने की एक
खासियत है,
आग में सारे भेदा भेद जल जाते है।लालच से भरपूर है कभी अलाव।अलाव ही एकमात्र जगह होती है
जहां लोग फुरसत से बैठते हैं।
अपनी बातें कहते और सुनते है।राजलक्ष्मी अग्रवाल
गुवाहाटी असम



