उड़ने दो मुझे

यह कविता स्वतंत्रता-चेतना, स्त्री-अस्मिता और जीवन की अनंत संभावनाओं के प्रति संवेदनशील आत्मबोध की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है।
उड़ने दो मुझे
उड़ने दो मुझे
आजाद पंछी हूं मैं ,
उड़ने दो मुझे
अंबर से भी ऊंचा उड़ना है।
मत बांधो किसी बंधन में
मुझे अभी नहीं मरना है।
बसंत की बसंती हवा हूं ,
आज यहां तो कल वहां हूं मैं।
संगीत की सात स्वर हूं ,
कान्हा की वंशी हूं मैं।
उड़ने दो मुझे
आजाद पंछी हूं मैं।
बिन कहे जो सबकुछ कह दे,
वो बुलंद आवाज हूं ,
आज तक जो न खुली,
वो अनोखी राज हूं मैं।
मुझे चांद को रखना है
अपनी हथेलियों पे ,
ये उम्र ठहरती ही नही,
बस इसलिए नाराज हूं मैं।
इस अनोखे कुदरत का
पूरा संसार ,
चाहती हूं मैं अपनी
आखों में समेटना,
बस उम्र न थम जाए
सोचकर डरती हूं मैं।
उड़ने दो मुझे ,
आजाद पंछी हूं मैं।
मैं ही सरस्वती ,
मैं ही लक्ष्मी
काली हूं ,
दुर्गा हूं मैं।
करदे जो मन पावन ,
वो पवित्र गंगा हूं मैं।
बिना मूल्य के तुम्हे ये ,
अमूल्य जीवन देनेवाली ।
वही ममतामयी *नारी* हूं मैं।
उड़ने दो मुझे
आजाद पंछी हूं मैं ।
उड़ने दो मुझे
अंबर से भी ऊंचा उड़ना है।
मत बांधो किसी बंधन में ,
मुझे अभी नहीं मरना है।
मोनालिसा पोद्दार




