कविता

विषय-यादें

 

 

 विषय-यादें

 

विद्या-कविता 

 

 

 

 

हुनर की वो पहली उड़ान 

 

याद आता है वो बचपन, और वो कलाकारी का प्यारा जुनून,

 

कोरे कागज़ पर रंग बिखेर कर, मिलता था दिल को सुकून।

 

पहली तस्वीर ‘लाल किले’ की, जब मन में एक उमंग जगी थी,

 

छोटे पापा के साथ हुनर की, एक अनोखी शर्त लगी थी।

 

“बना दोगी अगर इसे, तो लैपटॉप तुम्हारा हो जाएगा,”

 

सोचा न था वो चैलेंज, इतना प्यारा किस्सा बन जाएगा।

 

कुछ घंटों की मेहनत से, मेरी गुनु ने लाल किला बना डाला,

 

हुनर की उस चमक ने, पूरे घर में कर दिया उजाला।

 

छोटे पापा देख हैरान थे, बोले— “अमेजिंग, ये कमाल है!”

 

यकीन न था किसी को, कि ये एक बच्ची की मिसाल है।

 

पास बैठी दादी ने तब, मुस्कुराकर गवाही दी थी,

 

“सामने ही बनाया है इसने, कोई चीटिंग नहीं की थी।”

 

वो जीत का गौरव, वो लैपटॉप पाने की छोटी सी आस,

 

आज भी उन लम्हों में बसता है, एक जादुई अहसास।

 

फिर माँ-पापा की छवि को, गुनु ने कागज़ पर उकेरा था,

 

गुनु तब छोटी थी, जब खुशियों ने उसे चारों ओर से घेरा था।

 

दादा-दादी, बुआ-पापा, सब तस्वीर देख निहाल थे,

 

उसकी नन्हीं कलाकारी पर, सबके मन में ढेरों सवाल थे।

 

घर भर में शोर मचता रहा, वह सबको अपनी कला दिखाती थी,

 

अपनी ही बनाई दुनिया देख, वह मन ही मन मुस्काती थी।

 

आज भी वो रंग, वो पेंसिल, वो यादें दिल के पास हैं,

 

अपनों की वो हौसला-अफ़ज़ाई, सबसे बड़ा विश्वास है।

 

वक्त बदला, कलम थामी, पर वो कलाकार आज भी ज़िंदा है,

 

बीता हुआ वो हर पल, मेरी बिटिया की कामयाबी का बाशिंदा है।

 

ज्योती वर्णवाल 

 

मेरी स्वरचित रचना 

 

नवादा (बिहार)

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