दुनिया

विषय – शहरी जीवन

स्वरचित - कविता 

 

स्वरचित – कविता 

विषय – शहरी जीवन 

 

 

शहर में आकर न जाने मैं क्यों इस तरह पछताई?

गाँव के जैसा अपनापन मैं यहाँ आज तक न पायी…

दिन चढ़ते ही सड़कों पर हलचल उमड़ आती है,,

हर मोड़ पर वाहनों के कर्णविदारक शोर की क़तार लग जाती है l

 

 

कोई आँखों में सपने लिए आता है 

तो कोई अपने कंधों का बोझ ढोने जाता है,,

पर न जाने क्यों इतनी भीड़ में भी हर इंसान अकेला रह जाता है..??

 

 

कभी कोई अपना ही दिल को कष्ट पहुंचाता है 

तो कभी कोई अनजान बिना पूछे सहारा बन जाता है l

 

 

 

कभी किसी का फायदा किसी की गर्दन पर टिका रहता है 

तो कभी किसी की तरक्की किसी के गिरने से बनी रहती है,,,

 

 

 

शहर के बाजारों में फरेब सजता है बड़े -बड़े मकानों में..

पर सच्चाई मिलती है,, फुटपाथ पर बैठे आदमी की आंखों में…

 

 

 

इमारते इतनी ऊँची -ऊँची जैसे नभ को छूने का जूनून 

पर इनके साये में दब जाता है कई दिलों का सुकून 

गलियों के मोड़ पर फरेब का धुआँ उठता है 

इंसानों के बीच इंसान अपनी इंसानियत खो बैठता है l

 

 

यही तो शहरी जीवन का मिजाज है 

एक तरफ गिरहों में बँधा स्वार्थ होता है,,,,. तो दूसरी तरफ चुपचाप कभी खड़ा इंसानियत का हाथ होता है ll

 

 

 

नाम – ललिता डोभाल ‘प्रज्ञा ‘

पता – बड़कोट,, उत्तरकाशी (उत्तराखंड )

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